Sunday, 11 February 2018

पूर्णत्व की खोज

हम पूर्णत्व पाने की खोज में यहाँ वहाँ भटकते रहते हैं  पर हम ये भूल जाते है  कि हमें जो अपेक्षा दूसरों से है वही अपेक्षा किसी को हमसे है !पहले हमें अपनेआप में  पूर्णत्व  लाने का परिवर्तन करना है  पहले हमें सुधरना है फिर अगर हो सके तो अपने कार्य को इतना प्रभावशाली बनाना है  जिससे लोग हमसे प्रेरित होकर खुद ब खुद पूर्णत्व लाने का प्रयास करेंगे
    इतना सब कुछ जानने ,सोचने और लिखने के बाद भी क्या मैं  अपनेआप को पूर्ण गुणी बना पाई हूँ ?नहीं  !दुसरो में पूर्णता को खोजना और उसकी अपेक्षा करना जितना सहज सरल है उतना ही कठिन है अपनेआपको पूर्ण  व्यक्ति बना पाना !
   क्या इससे   यह साबित नहीं होता की हम खुद अपूर्ण होने पर भी हर व्यक्ति  में पूर्णता खोजते है ये जानते हुए  भी कि इस दुनिया में कोई भी पूर्ण नहीं है। !मगर फिर भी हमारा ये सफर हमें रुकाना नहीं है ,चलते ही जाना है पूर्णत्व की खोज में ...... आगे बढ़ना है  पूर्णत्व  की खोज में.......



Thursday, 14 January 2016

'नारी तेरे रूप अनेक ''

'नारी 'शब्द  शक्ति का प्रतीक  है ,और नारी को अपने जीवन में कई रूप लेने पड़ते है और वह ये सभी रूप अच्छी तरह से निभाती है। नारी से ही ये संसार चक्र आगे बढ़ता है। नारी ईश्वर का वरदान है ,जो हमें महानता  का ज्ञान देती है। अगर नारी न होती तो कुछ भी न होता। प्यार और बलिदान का दूसरा रूप 'नारी' है।
        नारी जब पुत्री के रूप में जन्म लेती है ,तो माता पिता के जीवनमे खुशियाँ  भर देती है। अपनी चहक से घर आँगन को महका देती है। जब विदा होकर ससुराल जाती है तो वहाँ  पर भी सबको सहजतासे अपना लेती है। अपना घर-बार,  माता -पिता सबको भुलाकर सास ससुर  को ही अपने माता पिता का दर्जा देती है और गृहलक्ष्मी  बनकर अपने कर्त्तव्य का पालन करती है। पत्नी  के रूपमे  वह पति को एवं  उसके परिवार के सदस्योंको ,उनके गुण -दोषो  सहित अपनाती है। उनकी पसंद -नापसंद का ख्याल रखती है। नारी में ही वह शक्ति है  जो हर नए रूप में अपनेआपको आसानी से ढाल सकती है। नारी का सर्वश्रेष्ठ  रूप ''मातृत्व'' का है। नौ महीने तक बच्चे को अपनी कोख में पालती है और प्रसूति की अपार  पीड़ा को सहकर संतान को जन्म देती है ,तब उसका दूसरा जन्म होता है। अपना अस्तित्व ही वो भूल  जाती है। संतान की परवरिश में ही वो अपना समय बिताती है ,उसकी हर बात में ममता झलकती  है ,उसकी सर्वश्रेष्ट परवरिश की बजह से ही तो हमें शिवा जी महाराज, महाराणा प्रताप और श्रीराम जैसे बहादुर पराक्रमी राजा मिल पाये। हर रूप में नारी की गरिमा कुछ और ही होती है। बहन के रूप में वह अपने भाई की मंगलकामना करके रक्षाबंधन और भाईदूज मनाती  है ,अपने भाई की सुख समृद्धि के लिए ईश्वर से प्रार्थना  भी करती है।
         जब वह सास बन जाती है तो आनेवाली बहु को अपनी बेटी मानकर उसका स्वागत करती है। उसे उसके कर्त्तव्य समझाते  हुए उसका  अधिकार सौंपती  है। उसे घर के रीतिरिवाज  समझाती  है। हर रूप में नारी श्रेष्ट है। उसके बगैर यह संसार अधूरा है।


Wednesday, 16 December 2015

'સંતાકુકડી '

મારા અંતરની જ્વાળાઓ  આક્રોશ બનીને બહાર આવે છે
મનની પીડા ક્રોધ બનીને શબ્દોમાં  ઉતરે છે
બીજા માટે છોડેલા કટાક્ષના તીર
મને જ ઘાયલ કરે છે !
જીવનના હિમાલયપથ પર શું  મેળવવું છે મારે ?
            મારી ભાવનાઓના વહેતા ધોધ રૂપી સંસારસાગરમાંથી
            સત્યરૂપી છીપ ક્યારે બહાર આવશે ?
મારા અંતર બાહ્ય અસ્તિત્વની સત્યતા
સહુ લોક કેમ જાણશે ?
ક્યાં સુધી આ દેહ આત્મા સાથે સંતાકુકડી રમશે ? 

'कॉलेजजीवन'

शाळा पूर्ण  झाली  आणि एका नवीन प्रवासासाठी मी तयार झाली. मनात खूप नवीन स्वप्न मी  रंगवलेली होती . माझ्या मनात काही भीती पण होत्या.  शाळेतल वातावरण खूप  वेगळं  होतं. शिक्षक थोडे कडक होते. आता कॉलेज  मध्ये सगळं कसं असणार याची सतत मनात धास्ती होती आणि नवीन जग हे कसं असेल त्या बद्दल मनात मी खूप कल्पना पण केल्या होत्या .
          आता मला युनिफोर्म  घालायची बंदी नाही दोन वेण्या घालायचं  बंधन नाही. पाहिजे तसं  तयार  होऊन  मी जाऊ शकत होती. मला जे काही नवीन स्वातंत्र्य  मिळणार होतं त्या साठी मी खूप आनंदात होती पण मी हे विसरली होती कि स्वातंत्र्या बरोबरच माझ्यावर नवीन जवाबदारी पडेल,मला स्वतःला जास्त हुशार,पाकट  बनवायला लागेल. अभ्यासा बरोबर मला इतर प्रव्रुतित पण भाग घ्यायला लागेल. एकट प्रवास करणं, पैसे संभाळणं ,हिशोब ठेवणं ,स्वतःची वस्तू संभाळणं हे सगळं  मला हळू हळू समजलं.जेवढं हे सगळं सोपं वाटतं  तेवढं ते सोपं नाही. आपले आई वडील किती कष्ट करतात त्याची मला आता जाण  झाली .
         कॉलेजजीवन  खूप चांगलं  आहे पण जसे जसे आपण स्वातंत्र्य मिळवतो तसे आपण वास्तविकतेच्या फार जवळ येत जातो आणि खर जग हे कसं असतं त्याची आपल्याला तेंव्हा  खरी ओळख  होते. स्वातंत्र्या बरोबरच जवाबदारी पण आपल्या पदरी पडते आणि आता पर्यंत आपल्या साठी जे निर्णय आई वडील घेत होते ते आता वेळ पडल्यास आपल्याला घ्यावे लागतात. आपल्या निर्णयशक्तिवर आपलं भविष्य अवलंबून असतं. एक चुकीचा निर्णय आणि सगळं उलटपालट होतं म्हणून सतत चांगल्या मित्रांच्या सोबत राहणं ,चांगल्या पुस्तकाचं वाचन करणं  खूप गरजेचं आहे त्यामुळे आपले विचार चांगले राहतात आणि आपण मनानी खूप भक्कम-द्रुढ  बनतो जे आपल्याला चुकीचा निर्णय घेउच  देत नहि. आपण सतत प्रगतीपंथावर पुढे पाउल मांडत सरकत जातो ,अगदी न थकता ,न हारता -------! . 

Tuesday, 26 February 2013

'दिल की चाहत'

इन लहराती हवाओं में
खोया है मेरा दिल।
ढूँढना  चाहती हूँ पर कैसे ढूँढू ?
       ये बहेती  ठंडी हवा ,
       अविरत आगे बढ़ती सोच ,
       बेरोकटोक उठते कदम
चंचल नदी सी मस्तियों  में खोकर
मै  सब कुछ भूल जाना चाहती हूँ
अपनेआप को'' फिर'' पाना चाहती हूँ !
       बारिश में भीगते हुए गुनगुनाना चाहती हूँ
       किसीके गीतों पर जी भर के थिरकना है मुझे !
समय के चक्र को पीछे घुमाकर
आपमें ही मै   खो जाना चाहती हूँ ,
''मै '' अब दिल की सुनना चाहती हूँ ------!!!

'अस्तित्व'

मुझमेँ  भी समाया है एक गहरा सत्य
अपने अस्तित्व का !
पल पल घुट रहा है जो 
और 
बढ़ रहा है अपने अंत की तरफ !
       काश किसीने संजोया होता उसे प्यारसे ,
       पिरोया होता मोतियों की तरह 
       और पौधों की तरह की होती उसकी देखभाल। 
काश कोई समझ पाया होता 
मेरे सत्य ''अस्तित्व'' को !!!

'કંઈક'

કંઈક  ખૂટી રહ્યું  છે જીવનમાં મારા ..  
શેની કમી છે સમઝાતું નથી?  
અસમંજસ  માં હું કેમ છું ખબર નથી?  
શું શોધું છું  વર્ષો થી?
ખુદ ને? આત્મા ના સ્વરૂપ ને?
કેમ હું તૃપ્ત નથી થતી?
ખાવું ,પીવું , ફરવું ,સુવું
દુનિયાદારી ,સંબંધો , આ વ્યવહાર,
આ જ બધા કામો કરીને મરવું , 
કે પછી  બીજું ખાસ કરવું?
સતત મન  ઘબરાય  છે 
બેચેની થી મુંઝાય  છે.
એક અલગ રસ્તે  ચાલવું છે  
.
પોતાનું અસ્તિત્વ  શોધવું  છે ,

મારે ખરેખર 'કંઈક' કરવું  જ  છે!